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दब्बाला राजगोपाल "राज" रेड्डी (जन्म 13 जून 1937) एक भारतीय मूल के अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक और एआई अग्रणी हैं। वे कार्नेगी मेलन के रोबोटिक्स संस्थान के संस्थापक निदेशक थे और उन्होंने एडवर्ड फीगेनबाम के साथ 1994 का ACM ट्यूरिंग पुरस्कार जीता।

दब्बाला राजगोपाल "राज" रेड्डी (जन्म 13 जून 1937) एक भारतीय मूल के अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शुरुआती अग्रणियों में से एक हैं। उन्होंने 50 से अधिक वर्षों तक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के संकाय में सेवा की, और कार्नेगी मेलन में रोबोटिक्स संस्थान के संस्थापक निदेशक थे। रेड्डी भारत में राजीव गांधी विश्वविद्यालय ज्ञान प्रौद्योगिकियों के निर्माण में सहायक थे और हैदराबाद के अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्होंने और एडवर्ड फेगेनबाम ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता में उनके काम के लिए 1994 का ACM ट्यूरिंग पुरस्कार जीता, जिसे कभी-कभी कंप्यूटर विज्ञान का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। रेड्डी एशियाई मूल के पहले व्यक्ति थे जिन्हें ट्यूरिंग पुरस्कार मिला।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

राज रेड्डी का जन्म वर्तमान आंध्र प्रदेश, भारत के चित्तूर जिले के कटूर गाँव में एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता, श्रीनिवासुलु रेड्डी, एक जमींदार थे, और उनकी माँ, पिच्चम्मा, एक गृहिणी थीं। वे अपने परिवार में कॉलेज जाने वाले पहले व्यक्ति थे। गिंडी इंजीनियरिंग कॉलेज (अब अन्ना विश्वविद्यालय का हिस्सा, मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध) से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद, वे एक प्रशिक्षु के रूप में ऑस्ट्रेलिया गए। न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में छात्र रहते हुए, उन्होंने इंग्लिश इलेक्ट्रिक ड्यूस मार्क II कंप्यूटर का उपयोग शुरू किया, जो एक वैक्यूम-ट्यूब मशीन थी जिसमें मर्करी डिले-लाइन मेमोरी और पंच-कार्ड इनपुट/आउटपुट था। उन्होंने 1960 में UNSW से MTech की डिग्री प्राप्त की और फिर एक अनुप्रयुक्त विज्ञान प्रतिनिधि के रूप में IBM में शामिल हो गए। 1963 में उन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने 1966 में जॉन मैकार्थी के अधीन कृत्रिम बुद्धिमत्ता में पहले डॉक्टरेट स्नातक के रूप में अपनी पीएचडी पूरी की। स्टैनफोर्ड संकाय में तीन साल बिताने के बाद, वे AI अग्रणी एलन नेवेल और हर्ब साइमन के साथ काम करने के लिए कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय में शामिल हुए।

स्टैनफोर्ड और कार्नेगी मेलन में करियर

रेड्डी ने अपना शैक्षणिक करियर 1966 से 1969 तक स्टैनफोर्ड में कंप्यूटर विज्ञान के सहायक प्रोफेसर के रूप में शुरू किया। फिर वे 1969 में कार्नेगी मेलन में एक एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में चले गए, 1973 में पूर्ण प्रोफेसर बने, और 1984 में विश्वविद्यालय प्रोफेसर नामित हुए। उन्होंने 1979 से 1991 तक रोबोटिक्स संस्थान के संस्थापक निदेशक और 1991 से 1999 तक स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंस के डीन के रूप में कार्य किया। डीन के रूप में, उन्होंने भाषा प्रौद्योगिकी संस्थान, मानव-कंप्यूटर इंटरैक्शन संस्थान, स्वचालित शिक्षण और खोज केंद्र (बाद में मशीन लर्निंग विभाग का नाम बदल दिया गया), और सॉफ्टवेयर अनुसंधान संस्थान बनाने में मदद की। उन्होंने स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंस में मोज़ा बिन्त नासिर चेयर भी संभाली।

अपनी विश्वविद्यालय भूमिकाओं से परे, रेड्डी 1999 से 2001 तक राष्ट्रपति की सूचना प्रौद्योगिकी सलाहकार समिति (PITAC) के सह-अध्यक्ष थे। वे अमेरिकन एसोसिएशन फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संस्थापकों में से एक थे और 1987 से 1989 तक इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन्होंने इज़राइल में पेरेस सेंटर फॉर पीस के अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड ऑफ गवर्नर्स और EMRI और HMRI की शासी परिषदों पर भी कार्य किया, जो संगठन भारत में ग्रामीण आबादी को लागत प्रभावी स्वास्थ्य देखभाल कवरेज प्रदान करने के लिए प्रौद्योगिकी-सक्षम समाधानों का उपयोग करते हैं।

AI अनुसंधान योगदान

रेड्डी का प्रारंभिक शोध स्टैनफोर्ड में AI प्रयोगशालाओं में आयोजित किया गया था, पहले एक स्नातक छात्र के रूप में और बाद में एक सहायक प्रोफेसर के रूप में, और 1969 से कार्नेगी मेलन में। उनका शोध बुद्धिमत्ता के अवधारणात्मक और मोटर पहलुओं पर केंद्रित था, जिसमें भाषण, भाषा, दृष्टि और रोबोटिक्स शामिल थे। पांच दशकों में, रेड्डी और उनके सहयोगियों ने बोली जाने वाली भाषा प्रणालियों के कई प्रदर्शन बनाए, जैसे रोबोट का आवाज नियंत्रण, बड़े-शब्दावली कनेक्टेड भाषण पहचान, वक्ता-स्वतंत्र भाषण पहचान, और अप्रतिबंधित शब्दावली श्रुतलेख। उन्होंने कार्य-उन्मुख कंप्यूटर आर्किटेक्चर, प्राकृतिक दृश्यों के विश्लेषण, सूचना तक सार्वभौमिक पहुंच, और स्वायत्त रोबोटिक प्रणालियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हियर्से I निरंतर भाषण पहचान में सक्षम पहली प्रणालियों में से एक थी। हियर्से II, ड्रैगन, हार्पी, और स्फिंक्स I/II जैसी बाद की प्रणालियों ने आधुनिक वाणिज्यिक भाषण पहचान प्रौद्योगिकी के अंतर्निहित कई विचारों को विकसित किया। इनमें से कुछ विचार, विशेष रूप से कई ज्ञान स्रोतों के समन्वय के लिए "ब्लैकबोर्ड मॉडल", अनुप्रयुक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पूरे स्पेक्ट्रम में अपनाए गए हैं। रेड्डी ने ज़ुएडोंग हुआंग और जेम्स के. बेकर के साथ भाषण पहचान की एक ऐतिहासिक समीक्षा भी सह-लेखक की।

समाज की सेवा में प्रौद्योगिकी

रेड्डी की अन्य प्रमुख शोध रुचि समाज की सेवा में प्रौद्योगिकी की भूमिका की खोज थी। एक प्रारंभिक प्रयास सेंट्रे मोंडियाल इंफॉर्मेटिक एट रिसोर्स ह्यूमेन था, जिसे 1981 में फ्रांस में जीन-जैक्स सेरवन-श्रेइबर द्वारा स्थापित किया गया था, जिसमें निकोलस नेग्रोपोंटे, एलन के, सेमुर पापर्ट, राज रेड्डी, और टेरी विनोग्राद शामिल एक तकनीकी टीम थी। रेड्डी ने केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया। केंद्र का उद्देश्य सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके तीसरी दुनिया के देशों में मानव संसाधन विकसित करना था, और इसने कम्प्यूटरीकृत कक्षाओं और ग्रामीण चिकित्सा वितरण प्रदान करने में कई महत्वपूर्ण प्रयोग किए। 1984 में, फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा मिटर्रैंड ने रेड्डी को लीजन ऑफ ऑनर पदक से सम्मानित किया।

1990 के दशक में, रेड्डी ने रॉबर्ट थिबाडो, जैम कार्बोनेल, माइकल शैमोस, और ग्लोरियाना एस. क्लेयर के साथ, यूनिवर्सल डिजिटल लाइब्रेरी परियोजना शुरू की, जिसमें पुस्तकों और संगीत, वीडियो, पेंटिंग, और समाचार पत्रों जैसे अन्य मीडिया को स्कैन करना शामिल था, जिसका उद्देश्य किसी भी रचनात्मक कार्य तक किसी भी व्यक्ति, कहीं भी, किसी भी समय ऑनलाइन पहुंच प्रदान करना था। एक बड़ी मिलियन बुक परियोजना 2001 में चीन (प्रोफेसर पैन युनहे, युटिंग ज़ुआंग, और गाओ वेन शामिल) और भारत (प्रोफेसर एन. बालाकृष्णन शामिल) के साथ एक सहयोगी प्रयास के रूप में शुरू की गई थी।

राजीव गांधी विश्वविद्यालय ज्ञान प्रौद्योगिकियां

रेड्डी 2008 में आंध्र प्रदेश में राजीव गांधी विश्वविद्यालय ज्ञान प्रौद्योगिकियों (RGUKT) बनाने में सहायक थे, डॉ. वाई. एस. राजशेखर रेड्डी और के. सी. रेड्डी के साथ। विश्वविद्यालय इस आधार पर स्थापित किया गया था कि वर्तमान देशव्यापी योग्यता-आधारित प्रवेश, जैसे SAT परीक्षण, दोषपूर्ण हैं और ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए एक समान अवसर प्रदान नहीं करते हैं। ग्रामीण छात्र शिक्षक गुणवत्ता, माता-पिता की शिक्षा, कोचिंग के लिए भुगतान करने की क्षमता, और सीखने पर बिताए गए समय जैसे कारकों में गंभीर नुकसान में होते हैं। RGUKT को कम आय वाले, प्रतिभाशाली, ग्रामीण युवाओं की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। रेड्डी ने 2008 से 2019 तक RGUKT के संस्थापक कुलाधिपति के रूप में कार्य किया।

बाद की पहल और विरासत

रेड्डी ने प्रस्तावित किया कि एक पूरी तरह से जुड़ी आबादी हर गाँव में केजी-से-पीजी ऑनलाइन कॉलेज की कल्पना करना संभव बनाती है, जो व्यक्तिगत निर्देश प्रदान करती है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि सभी छात्रों को प्राथमिक शिक्षा के हिस्से के रूप में डिजिटल साक्षरता और सीखने-कैसे-सीखें प्रशिक्षण दिया जाता है, इससे पहले कि वे स्कूल छोड़ दें, कोई भी किसी भी विषय को किसी भी उम्र में सीख सकता है, यहां तक कि विषय पर योग्य शिक्षकों के बिना भी। उन्होंने यह भी खोजा कि कैसे मशीन लर्निंग और AI का उपयोग व्यक्तियों और समुदायों को सशक्त बनाने के लिए किया जा सकता है।

रेड्डी की विरासत कई संस्थानों में फैली हुई है। वे हैदराबाद के अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष थे और इसकी शासी परिषद के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। भाषण पहचान में उनके काम ने बाद के गहन शिक्षण और तंत्रिका नेटवर्क विकास के लिए नींव रखी, जो अब आधुनिक बड़े भाषा मॉडल को शक्ति देते हैं। रोबोटिक्स और AI शिक्षा में उनके योगदान ने स्टैनफोर्ड AI लैब और MIT CSAIL और उससे परे शोधकर्ताओं की पीढ़ियों को प्रभावित किया है।

पुरस्कार और सम्मान

1994 के ACM ट्यूरिंग पुरस्कार के अलावा, रेड्डी को कई अन्य सम्मान मिले। 1984 में उन्हें लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया। वे नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग और अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज के लिए चुने गए। उन्हें AI और रोबोटिक्स में उनके योगदान के लिए ओकावा पुरस्कार और होंडा पुरस्कार भी मिला। उनके काम को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली है, और उन्होंने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान संगठनों के लिए सलाहकार बोर्डों पर कार्य किया है।

व्यक्तिगत जीवन और प्रभाव

रेड्डी की भारत के एक ग्रामीण गाँव से कंप्यूटर विज्ञान के शिखर तक की व्यक्तिगत यात्रा एक प्रेरणा रही है। उन्होंने कई छात्रों को मार्गदर्शन दिया जो AI में नेता बने, जिनमें वे लोग शामिल हैं जिन्होंने गूगल डीपमाइंड और OpenAI जैसी कंपनियों में भाषण पहचान प्रणालियों के विकास में योगदान दिया। सामाजिक भलाई के लिए प्रौद्योगिकी पर उनका जोर विकासशील देशों में शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल परियोजनाओं को प्रभावित करना जारी रखता है।

रेड्डी कार्नेगी मेलन में प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में सक्रिय रहते हैं, जहाँ वे अनुसंधान और नीति पर सलाह देना जारी रखते हैं। सूचना और शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच का उनका दृष्टिकोण इंटरनेट और जनरेटिव AI के युग में तेजी से प्रासंगिक हो गया है।

यह भी देखें

संदर्भ

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जीवनी संबंधी जानकारी और शैक्षणिक रिकॉर्ड पर आधारित है। आगे पढ़ने के लिए, ACM ट्यूरिंग पुरस्कार उद्धरण और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के संकाय पृष्ठ देखें।

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